Saturday, 4 February 2017

बड़े बुजुर्ग
जब घर के बड़े बुज़ुर्ग चले जाते है
घर के दरवाजे रोशनदान हो जाते हैं!
ड्योढियों के बँटवारे हो जाते है
आँगन फिर वीरान हो जाते हैं!
रिश्तों में चुन जाती है दीवारें
खुशियों के कटोरों में छेद हो जाते हैं!
उस घर के इतिहास लिखे कैलेंडर
फिर सड़कों पर बिखर जाते हैं!
देहरी पर पड़ी बुज़ुर्ग की चप्पल से
हमेशा डरे सहमे से रहे, मवाली!
उसी गली के शेर हो जाते हैं!
फिर वो
रोशनदान बने हुए दरवाजे
कई जोड़ी आँखें बन जाते हैं!

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